शनिवार, 28 सितंबर 2013

ओना त आय पारण छ्य जिउतिया  पावनि के मुदा किछ मोन में छल आ किछ सुनल छल पितामाहिक मुँह सँ जेना कि
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जितिया पावनि बड्ड भारी ,
       धिया पुता के ठोकि सुतौलनी
अपने   लेलनि  भरि  थारी |
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जितियाक कथा भिन्न भिन्न रुपे लोक में प्रचलित अछि किन्तु कथा में आयल जिमुतवाहनक  नाम, प्रथम शताब्दी में लिखल
"गुनाधाय" जे कि पैशाचिक भाषा (प्राचीन कश्मीरी भाषा  ) में लिखल अछ, तदनंतर ,वृहत्कथामंजरी (सातम शताब्दी )आ कथासरित्सागर (एगारहम शताब्दी )  में वृहद रूप सँ वर्णित अछि एवं कथा में आयल गरुड़क प्रसंग महाभारत सँ लेल गेल अछि ,जीमूतवाहन देवता छलाह कि नहि से नहीं जानि मुदा ओ विद्याधर जाति के छलाह , मनुक्ख आ देवताक बीच मेंका जाति |
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धन्य हमर मैथिल परम्परा जे कतहु सँ आ कथू बिछि  बना दैत अछि ककरो महान |
धन्य हमर मैथिल माय जे कहिनी सुनि पावनि राखि धिया पुता माँगथि सुरुज चान ||

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