मंगलवार, 20 अप्रैल 2010

नओत

अप्पन खिस्सा  में हम नाढ़िया के हुआं हुआं  नहि कर देबय  तैं की हम्मर कुक्कुर भूकत नहि  से केना हेतै . खिस्सा हम्मर, अहाँ कान- बात  दी चाहे नहि दी, आहि    रौ ब्बा ,   इ   की   भेलैय,    अहाँ नहि सुनबय  त हम्मर  खिस्से   ख़तम   नहि हेतैय    की  यौ फल्लांबाबु . से  सैह......... .धुत्त......  किदन कहलके जे ...
बेस  त  एकटा बात  मोने मोने घुर्घुराय अछी जे खिस्सा के बिच में हुम्हुम्मा करय  बला  त चाही तैं यौ   फल्लां बाबु अहाँ के सुनय चाही हम्मर कुक्कुरक कटौझ 

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