अप्पन खिस्सा में हम नाढ़िया के हुआं हुआं नहि कर देबय तैं की हम्मर कुक्कुर भूकत नहि से केना हेतै . खिस्सा हम्मर, अहाँ कान- बात दी चाहे नहि दी, आहि रौ ब्बा , इ की भेलैय, अहाँ नहि सुनबय त हम्मर खिस्से ख़तम नहि हेतैय की यौ फल्लांबाबु . से सैह......... .धुत्त...... किदन कहलके जे ...
बेस त एकटा बात मोने मोने घुर्घुराय अछी जे खिस्सा के बिच में हुम्हुम्मा करय बला त चाही तैं यौ फल्लां बाबु अहाँ के सुनय चाही हम्मर कुक्कुरक कटौझ