फूलक सिनेह आई छई ककरा प्रति
रंग सुगंध आई छई जकरा प्रति
हेतई समर्पित आई ओ तकरा प्रति
ठाम ठाम ढेरिआयल रहय धान
खरिहान में
बैसल रहय गोबराहा बाबा
गोबरौरक कपाड
आ की
गेनाक थोंका बेसम्हार
सितायल, कठुआयल
खरिहानक नार-पुआर
टीक पर घोंपल गेना महान
कन्हुआ क दय छय तान
बूडले रहतह तोहर कपाड
देखहक ने ढेरीक नीचामे पडल
छय आंजुर भरि
सिंगरहार
गोबराहा बाबौवाचः
तू गेना, गोबरक ढ़ेरी ऊपर
फूल ओ सुच्चा निच्चा परल
हुब्बा ककर करतौ तोहर परतर
ओकरा निच्चासन तोरा टीकासन
Mithila,Maithil,Maithili
मचान पर बैसि लग्गी सँ बथुआ तोड्बाक प्रयास केनिहार के समर्पित अछि ई नवका दलान
सोमवार, 5 दिसंबर 2022
मंगलवार, 19 अगस्त 2014
धन्वन्तरी सूत्र
मैथिल कोकिल विद्यापति द्वारा लिखल धन्वन्तरी क परामर्श सरिपहूँ अर्वाचीन रहितहु समीचीन अछि
कोटिशः नमन
हमार प्रयास एतबे जे इ फकडा फेर स जिवंत भ उठय आ व्यक्ति अप्पन नीक स्वास्थ्य स निक विचार संग जिनगी सम्पूर्ण करथि
कोटिशः नमन
हमार प्रयास एतबे जे इ फकडा फेर स जिवंत भ उठय आ व्यक्ति अप्पन नीक स्वास्थ्य स निक विचार संग जिनगी सम्पूर्ण करथि
शनिवार, 28 सितंबर 2013
ओना त आय पारण छ्य जिउतिया पावनि के मुदा किछ मोन में छल आ किछ सुनल छल पितामाहिक मुँह सँ जेना कि
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जितिया पावनि बड्ड भारी ,
धिया पुता के ठोकि सुतौलनी
अपने लेलनि भरि थारी |
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जितियाक कथा भिन्न भिन्न रुपे लोक में प्रचलित अछि किन्तु कथा में आयल जिमुतवाहनक नाम, प्रथम शताब्दी में लिखल
"गुनाधाय" जे कि पैशाचिक भाषा (प्राचीन कश्मीरी भाषा ) में लिखल अछ, तदनंतर ,वृहत्कथामंजरी (सातम शताब्दी )आ कथासरित्सागर (एगारहम शताब्दी ) में वृहद रूप सँ वर्णित अछि एवं कथा में आयल गरुड़क प्रसंग महाभारत सँ लेल गेल अछि ,जीमूतवाहन देवता छलाह कि नहि से नहीं जानि मुदा ओ विद्याधर जाति के छलाह , मनुक्ख आ देवताक बीच मेंका जाति |
.
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धन्य हमर मैथिल परम्परा जे कतहु सँ आ कथू बिछि बना दैत अछि ककरो महान |
धन्य हमर मैथिल माय जे कहिनी सुनि पावनि राखि धिया पुता माँगथि सुरुज चान ||
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जितिया पावनि बड्ड भारी ,
धिया पुता के ठोकि सुतौलनी
अपने लेलनि भरि थारी |
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जितियाक कथा भिन्न भिन्न रुपे लोक में प्रचलित अछि किन्तु कथा में आयल जिमुतवाहनक नाम, प्रथम शताब्दी में लिखल
"गुनाधाय" जे कि पैशाचिक भाषा (प्राचीन कश्मीरी भाषा ) में लिखल अछ, तदनंतर ,वृहत्कथामंजरी (सातम शताब्दी )आ कथासरित्सागर (एगारहम शताब्दी ) में वृहद रूप सँ वर्णित अछि एवं कथा में आयल गरुड़क प्रसंग महाभारत सँ लेल गेल अछि ,जीमूतवाहन देवता छलाह कि नहि से नहीं जानि मुदा ओ विद्याधर जाति के छलाह , मनुक्ख आ देवताक बीच मेंका जाति |
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धन्य हमर मैथिल परम्परा जे कतहु सँ आ कथू बिछि बना दैत अछि ककरो महान |
धन्य हमर मैथिल माय जे कहिनी सुनि पावनि राखि धिया पुता माँगथि सुरुज चान ||
मंगलवार, 20 अप्रैल 2010
नओत
अप्पन खिस्सा में हम नाढ़िया के हुआं हुआं नहि कर देबय तैं की हम्मर कुक्कुर भूकत नहि से केना हेतै . खिस्सा हम्मर, अहाँ कान- बात दी चाहे नहि दी, आहि रौ ब्बा , इ की भेलैय, अहाँ नहि सुनबय त हम्मर खिस्से ख़तम नहि हेतैय की यौ फल्लांबाबु . से सैह......... .धुत्त...... किदन कहलके जे ...
बेस त एकटा बात मोने मोने घुर्घुराय अछी जे खिस्सा के बिच में हुम्हुम्मा करय बला त चाही तैं यौ फल्लां बाबु अहाँ के सुनय चाही हम्मर कुक्कुरक कटौझ
बेस त एकटा बात मोने मोने घुर्घुराय अछी जे खिस्सा के बिच में हुम्हुम्मा करय बला त चाही तैं यौ फल्लां बाबु अहाँ के सुनय चाही हम्मर कुक्कुरक कटौझ
रविवार, 29 नवंबर 2009
मातृभाषा प्रेम
बोली प्रति सिनेह जओ देखबाक हो त अप्पन मैथिल खास क ओ मैथिल बंधुवर जे अपना के प्रवासी कहय छथि हुनका सभ स छोखगर उदाहरण तकनाई व्यर्थ अछि . अप्पन संघ ,समाज ,संगठन ,चेतना ,मंच ,मचान आ दलान जेना तेना तानि क कोनो ने कोनो नवतुरिया वर्ग के बसिया चासनी में अद्धपक्कू कथा पेहानी सुना मैथिलि भाषा केर प्रति और मोअन घोर क दैत छथिन्ह और मंच सँ उतरि अंगरेजिया बोली में बाजि अप्पन औघोतनाइ प्रदर्शित करय छथि ( इ ब्लॉग पढ़निहार निशंक रहथु की जे लिखनिहार के कोनो आ किनको प्रति भावनात्मक हिंसा करबाक भावना नहीं अछि ,एकरा केवल मात्र प्रतिक्रिया टा बुझी )
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